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Showing posts from February, 2021

निर्माणों के पावन,,,,संघ गीत

निर्माणों के पावन युग में हम चरित्र निर्माण न भूलें ! स्वार्थ साधना की आंधी में वसुधा का कल्याण न भूलें !! माना अगम अगाध सिंधु है संघर्षों का पार नहीं है किन्तु डूबना मझधारों में साहस को स्विकार नही है जटिल समस्या सुलझाने को नूतन अनुसन्धान न भूलें !! शील विनय आदर्श श्रेष्ठता तार बिना झंकार नही है शिक्षा क्या स्वर साध सकेगी यदि नैतीक आधार नहीं है कीर्ति कौमुदी की गरिमा में संस्कृति का सम्मान न भूले !! आविष्कारों की कृतियों में यदि मानव का प्यार नही है सृजनहीन विज्ञान व्यर्थ है प्राणी का उपकार नही है भौतिकता के उत्थानों में जीवन का उत्थान न भूलें !!

संघ गीत

 हिन्दु जगे तो विश्व जगेगा मानव का विश्वास जगेगा भेद भावना तमस ह्टेगा समरसता अमर्त बरसेगा हिन्दु जगेगा विश्व जगेगा हिन्दु सदा से विश्व बन्धु है जड चेतन अपना माना है मानव पशु तरु गीरी सरीता में एक ब्रम्ह को पहचाना है जो चाहे जिस पथ से आये साधक केन्द्र बिंदु पहुचेगा ॥१॥ इसी सत्य को विविध पक्ष से वेदों में हमने गाया था निकट बिठा कर इसी तत्व को उपनिषदो में समझाया था मन्दिर मथ गुरुद्वारे जाकर यही ज्ञान सत्संग मिलेगा ॥२॥ हिन्दु धर्म वह सिंधु अटल है जिसमें सब धारा मिलती है धर्म अर्थ ओर काम मोक्ष की किरणे लहर लहर खिलती है इसी पुर्ण में पुर्ण जगत का जीवन मधु संपुर्ण फलेगा इस पावन हिन्दुत्व सुधा की रक्षा प्राणों से करनी है जग को आर्यशील की शिक्षा निज जीवन से सिखलानी है द्वेष त्वेष भय सभी हटाने पान्चजन्य फिर से गूंजेगा ॥३ यहि घडी है हिन्दु युवको जगत पुनर्निर्माण की आओ नवयुग की प्रतिमा मे करे प्रतिष्ठा प्राण की॥धृ॥ महाकाल ने परिवर्तन का क्रम फिरसे दोहराया है इस धरती पर स्वर्ग सृजन का सन्देषा पहुन्चाया है नवनिर्माण हो सके ऐसा वातावरण बनाया है दसोदिशाओ ने अन्तर से यह तू...

संघ की प्रार्थना

 संघ की प्रार्थना   नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्। महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥ १॥ प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम् त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम् शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये। अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्॥ २॥ समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं परं साधनं नाम वीरव्रतम् तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम्। विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर् विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्। परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥ ३॥ ॥ भारत माता की जय ॥ संघ की प्रार्थना का अर्थ – हे वात्सल्यमयी मातृभूमि, तुम्हें सदा प्रणाम! इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस भूमि को बार-बार ...